राम की लीला राम ही जाने....राम कथा उवाच
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गुना। इन दोनों सज्जनों को मैं नहीं जानता था। आज जब ये दूसरों के कंधे पर हाथ रखकर दशहरा मैदान गुना में कथा स्थल पर आए तो देखकर लगा कि ये दृष्टिहीन हैं। दोनों अपने एक एक सहयोगी के साथ आकर पंडाल में बैठ गए। जिज्ञासा वश पास जाकर दोनों से चर्चा की तो हतप्रभ रह गया।
इनमें बाईं ओर बैठे श्रृद्धालु का नाम सूर सिंह डुडवे है। एमए पास हैं। अलीराजपुर के पास जोबट तहसील के गांव खटकली के रहने वाले हैं।
फिलहाल पीएनबी भोपाल में क्लर्क हैं। इन्हें दो वर्ष की आयु में दिखना बंद हो गया था। इसी तरह काला चश्मा लगाए सज्जन का नाम ब्रजेश कुर्मी है। पीएचडी कर रहे हैं। नेट क्वालिफाइड हैं। दृष्टिहीन हैं। सागर में राजस्व विभाग में कार्यरत हैं। अभी अटेचमेंट पर दृष्टिहीन बच्चों को पढ़ाते हैं।
सूर सिंह और ब्रजेश दोनों श्रीराम कथा सुनने आए हैं। कल 10 मई को यहीं पर बागेश्वर बालाजी के भक्त धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी के दिव्य दरबार में भी शामिल होंगे। इन दोनों के मन में ईश्वर के प्रति अगाध श्रृद्धा है। दोनों ही मानते हैं कि ईश्वर की अनुकंपा ही है कि हम दृष्टिहीन होने के बाद भी पढ़ लिख लिए और नौकरी कर रहे हैं। इन्हें विश्वास है कि ईश्वर की कृपा होगी तो हमें खोई दृष्टि भी मिल ही जाएगी। इसीलिए ईश्वर का नाम लेते हैं और ऐसे आयोजन में शामिल होने का प्रयत्न करते हैं।
इन दोनों भाइयों की अगाध श्रृद्धा और ईश्वर के प्रति विश्वास को देखकर मन भावुक हो गया। वास्तव में ये आंखों से लाचार होंगे लेकिन ये उन आंख वालों से बेहतर हैं जिन्हें सनातन के पुण्य पुनीत धार्मिक आयोजनों में भी सिर्फ खोट दिखाई देता है। ऐसी खोटी दृष्टि वाले अंधों का भी भगवान भला करें। सबका अपना अपना प्रारब्ध है।
इन दोनों सज्जनों का प्रारब्ध है कि इन्हें श्री राम भजन का अवसर मिल रहा है, ईश्वर की कृपा से ही सज्जनों को ऐसे अवसर मिल पाते हैं। वो भी बड़भागी हैं जो अपने मन में श्रीराम का सुमिरन करते रहते हैं। लेकिन उन अभागों को क्या कहें जो न तो खुद श्री राम का सुमिरन करते हैं और यदि कोई और सुमिरन करे या कराए तो उन्हें भारी बैचेनी होने लगती है।
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