'मेरे पास भारत में कोई संपत्ति नहीं', भाजपा के दावों पर सैम पित्रोदा का जवाब, आरोपों को बताया निराधार
कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने भारत संपत्ति को लेकर भाजपा के आरोपों को निराधार बताते हुए पूर्ण रूप से खंडन किया है। सैम पित्रोदा ने कहा कि उनके पास भारत में कोई जमीन, घर या स्टॉक नहीं है और न ही उन्होंने कभी किसी सरकारी पद पर रहते हुए वेतन लिया या रिश्वत ली।
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नई दिल्ली (आरएनआई) कांग्रेस के विदेश इकाई के प्रमुख सैम पित्रोदा अधिकतक अपने बयानों के चलते चर्चा में रहते है। इसी बीच इन दिनों भारत में उनकी संपत्ति को लेकर चल रही बातचीत के बीच पित्रोदा ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बुधवार को कहा कि उनके पास भारत में कोई जमीन, घर या स्टॉक नहीं है। बता दें कि पित्रोदी का यह बयान भाजपा नेता एनआर रमेश द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पित्रोदा ने भारत में 150 करोड़ रुपये की 12.35 एकड़ सरकारी जमीन अवैध रूप से हासिल की है।
पित्रोदा ने अपनी सफाई में कहा कि भारतीय मीडिया में आई रिपोर्ट्स के बाद वह स्पष्ट करना चाहते हैं कि उनके पास भारत में कोई संपत्ति नहीं है और न ही उन्होंने कभी किसी सरकारी पद पर रहते हुए वेतन लिया या रिश्वत ली। साथ ही पित्रोदा ने यह भी कहा कि उन्होंने 1980 और 2004 से 2014 तक राजीव गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह के साथ काम करते हुए कभी कोई वेतन नहीं लिया। पित्रोदा ने यह भी कहा कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में, यानी 83 साल की उम्र में, भारत या किसी दूसरे देश में कभी भी रिश्वत नहीं दी और न ही स्वीकार की। उन्होंने भाजपा के इस आरोप को पूरी तरह से असत्य बताया।
मामले में भाजपा नेता रमेश ने सैम पित्रोदा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और लोकायुक्त के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। बृहत बंगलूरू महानगर पालिका (बीबीएमपी) के पूर्व पार्षद एनआर रमेश का आरोप है कि पित्रोदा ने वन विभाग के अधिकारियों समेत पांच वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की मदद से बंगलूरू के येलहंका में 150 करोड़ रुपये की 12.35 एकड़ सरकारी जमीन अवैध रूप से हासिल की। साथ ही रमेश का आरोप है कि पित्रोदा ने वन विभाग के अधिकारियों की मदद से कर्नाटका के बेंगलुरु में येलहंका इलाके में यह भूमि प्राप्त की।
इतना ही नहीं भाजपा नेता रमेश के अनुसार, पित्रोदा ने 1993 में एक संस्था पंजीकरण कराया था और कर्नाटका के वन विभाग से औषधीय जड़ी-बूटियों के लिए जमीन का पट्टा लिया था। हालांकि, पट्टे की अवधि 2011 में समाप्त हो गई थी, लेकिन विभाग ने भूमि वापस नहीं ली, जिसके बाद आरोप लगाया गया कि पित्रोदा ने भूमि को अवैध रूप से अपने कब्जे में रखा।
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